डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने की आशंका 2026 तक सीमित रहेगा दायरा

भारतीय रुपया 2026 के अंत तक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 95 रुपये के स्तर के आसपास सीमित दायरे में रह सकता है। मौजूदा समय में रुपया लगभग 95.20 प्रति डॉलर पर कारोबार कर रहा है। फिच समूह की कंपनी बीएमआई की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक तनाव खासकर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बना रहा है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर इसका असर ज्यादा देखने को मिल रहा है। हालांकि, आरबीआई के हस्तक्षेप और मुनाफे की धीमी वापसी (रिपैट्रिएशन) रुपये की तेज गिरावट को रोकने में मदद कर सकते हैं।
मार्च-अप्रैल में गिरावट के बाद आर्थिक अनुमान स्थिर
मार्च और अप्रैल 2026 के दौरान भारतीय रुपया लगभग 4 प्रतिशत कमजोर हुआ और अब यह 95.20 के स्तर पर स्थिर बना हुआ है। बीएमआई ने भारत की आर्थिक स्थिति पर सकारात्मक अनुमान जताते हुए कहा है कि वित्त वर्ष 2026-27 में देश की जीडीपी वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रह सकती है जबकि महंगाई दर लगभग 3.4 प्रतिशत रहने की संभावना है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आरबीआई लगातार मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को स्थिर रखने की कोशिश कर रहा है। इसके बावजूद वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण मुद्रा में उतार-चढ़ाव बना रहेगा।
चालू खाता घाटा और ऊर्जा आयात से बढ़ता दबाव
बीएमआई के अनुसार ईरान संघर्ष के कारण भारत का चालू खाता घाटा बढ़कर वित्त वर्ष 2026-27 में जीडीपी का लगभग 1.3 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। इसका मुख्य कारण देश की ऊर्जा आयात पर भारी निर्भरता है जो कुल आयात का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा है। इसके अलावा खाड़ी देशों से आने वाले धन प्रेषण में कमी भी घाटे को बढ़ा सकती है। 2025 में भारत के कुल रेमिटेंस का 38 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आया था जो जीडीपी का करीब 1 प्रतिशत है। अगर वहां रोजगार और आय प्रभावित होती है तो भारत की आर्थिक स्थिति पर और दबाव बढ़ सकता है।
विदेशी निवेश और आरबीआई की भूमिका से तय होगा भविष्य
बीएमआई की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक अनिश्चितताओं और युद्ध जैसे हालात के कारण विदेशी निवेश प्रवाह कमजोर रह सकता है। मार्च में 13.4 अरब डॉलर की पूंजी निकासी हुई जो महामारी के बाद सबसे बड़ा आउटफ्लो माना जा रहा है। पिछले एक साल में रुपया करीब 10 प्रतिशत कमजोर हुआ है जिससे आरबीआई पर दबाव बढ़ा है कि वह बाजार में सक्रिय भूमिका निभाए। आने वाले समय में आरबीआई विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रुपये को स्थिर रखने की कोशिश कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक जोखिम कम न होने तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है।





